नरेंद्र मोदी-कांग्रेस पार्टी ने की जातिवाद और सांप्रदायिकता पर वोटबैंक की राजनीति |

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  • राजस्थान में प्रधानमंत्री के 6 अक्टूबर के भाषण में विरोधाभास

जयपुर. अजमेर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का 50 मिनट का भाषण 2 बजकर 50 मिनट पर समाप्त हुआ और उसके ठीक 10 मिनट बाद चुनाव आयोग ने पांच राज्यों में चुनावों की घोषणा की। चुनाव आयोग ने 12:30 पर चुनाव घोषणा के लिए समय तय किया था, परन्तु इसे 3 बजे कर दिया। मीडिया में इस पर प्रश्न उठे हैं। प्रधानमंत्री का भाषण मैंने ध्यान से सुना। संपूर्ण भाषण में वोटबैंक, नौकरशाही, कांग्रेस की भर्त्सना, परिवारवाद, सामाजिक व सांस्कृतिक विभाजन, सर्जिकल स्ट्राइक आदि विषयों का उल्लेख किया।

राजनीति का सामाजिक विश्लेषण

  1. प्रधानमंत्री ने इन विषयों को संकुचित ढंग से परिभाषित किया। वोटबैंक की राजनीति प्रजातंत्र का आधार है। वोटबैंक का ध्रुवीकरण विचारधारा, विकास की प्रक्रिया, सामाजिक व आर्थिक आधार पर न्याय से प्रजातंत्र दृढ़ होगा। प्रधानमंत्री ने इस बारे में चर्चा न करके कांग्रेस पार्टी पर जातिवाद और सांप्रदायिकता के आधार पर वोटबैंक की राजनीति करने का आरोप लगाया। यह एक गम्भीर विरोधाभास है। भाजपा खुले रूप में साम्प्रदायिक कार्ड खेलती रही है। भाजपा निरपेक्ष रही है? भाजपा पर लगे आरोप, अब वह कांग्रेस पर लगा रही है।
  2. एक अन्य विरोधाभास ब्यूरोक्रेसी पर। कांग्रेस पर आरोप लगाया गया कि विशेष नौकरशाहों को आगे रखा। कुछ दिनों पहले एक समाचार-पत्र में प्रकाशित हुआ था कि प्रधानमंत्री कार्यालय में 18 उच्चाधिकारी गुजरात कैडर के हैं। रिजर्व बैंक, नीति आयोग व अन्य राष्ट्रीय व शिक्षण संस्थाओं में एक विशिष्ट पृष्ठभूमि के व्यक्ति नियुक्त किए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने तो हार्वर्ड पर ‘हार्डवर्क’ को महता दी है।

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  1. परिवारवाद-वंशवाद में फर्क है। इंदिरा गांधी ने 1969 में राजा-महाराजाओं की प्रिवी पर्स समाप्त कर सामंती प्रवृत्ति को रोका। चुनाव द्वारा जीतकर आने पर परिवारवाद नहीं पनपता है। एक सत्ताधारी व्यक्ति अन्य व्यक्तियों के अवसरों को नजरअंदाज कर परिवार व कुनबे के लोगों को अवसर देता है तब परिवारवाद है। देश में, कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, तमिलनाडु, महाराष्ट्र आदि प्रदेशों मे परिवाद राजनीति में चरम सीमा पर रहा है।
  2. प्रधानमंत्री इन प्रांतों के परिवार-वादियों का कभी नाम नहीं लेते। क्यों? अटल बिहारी वाजपेयी नेहरू, इंदिरा व राजीव की प्रशंसा करते थे। प्रधानमंत्री मोदी को एक सही योगदान को स्वीकार करने में झिझक क्यों है? क्या वाजपेयी गलत थे?
  3. सर्जिकल स्ट्राइक एक महत्वपूर्ण एक दिवसीय घटना थी। इसकी तुलना 1965, 1971 व पाकिस्तान के विरुद्ध अन्य युद्धों से नहीं की जा सकती। ऐसा प्रदर्शित करना कि ऐसी घटना एक अजूबा थी, पूर्व के युद्धों को छोटा करके दिखाना है। आज हमारी सीमा अशांत है। उग्रवाद और माओवाद सिर उठाए हुए हैं।
  4. प्रधानमंत्री के 50 मिनट के भाषण में आधारभूत संरचनात्मक मुद्दों का उल्लेख नहीं था। शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं में गुणवत्ता पर कुछ नहीं कहा गया। गांव व शहर के बीच अवसरों में 9 गुणा अंतर है। क्या इसको पाटने का प्रयास नहीं होना चाहिए? स्त्री-पुरुष के बीच भेदभाव व बालिकाओं से बलात्कार व हत्या बढ़ते जा रहे हैं। अपराध व भ्रष्टाचार आम जीवन को दीमक की तरह चाट रहे हैं। स्वच्छ भारत के नारों के बीच गंदगी के ढेर दिखते हैं। अतिक्रमण हैं। रोजगार के अवसरों पर हर जगह अड़चने हैं। ये मुद्दे कोई छूता ही नहीं।
  5. सार है- प्रधानमंत्री को गम्भीर मंथन द्वारा समताकारी नागरिक समाज निर्माण की ओर आगे बढ़ना चाहिए। यह सोच लुभावनी व चटकारी भाषा के उपयोग भर से सम्भव नहीं है। (यह लेखक के निजी विचार हैं) 

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